इस ब्लॉग से मेरी अनुमति के बिना

कोई भी रचना कहीं पर भी प्रकाशित न करें।

Sunday, 5 January 2014

नया साल  - नया संकल्प
-------------------------
भरेंगे खुशियों के रंग
---------------
पृथ्वी का सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाना  यानि समय के चक्र का घूमना। इस अनवरत चलने वाली प्रक्रिया को हमने महीनों और वर्षों में बाँट दिया। आवश्यक भी था ताकि प्रकृति और मौसम की अदाओं को उनकी  अवधि से जाना जा सके। काल खण्डों का ज़खीरा एक निश्चित अवधि में नए साल का तोहफा हमें दे जाता है। बारिश अपनी सिसकती बूंदों के साथ ज्यों ही विदा हुआ शीत ने पांव फैलाना आरम्भ कर दिया। फिर लम्बी उबाऊ रात ,मानों जाते - जाते भी जाने का मन हो। रात की स्याही का एक कतरा  भोर की बेहद नाज़ुक सफेदी के साथ मिलकर अजीब सम्मोहन पैदा करता है। यही है वह संधिकाल जब मेरे सामने के विशाल अमलतास और अशोक की डालियों में ऋत्विज सा प्रभाती  गान  करता खगदल उड़ने को व्याकुल हो जाता है। भोर होने का   आभास अलौकिक है। मैं पिछले बीस सालों से उगते सूरज का गवाह बन उसकी अक्षुण्ण ऊर्ज़ा को महसूस कर रही  हूँ। साथ होते हैं कुछेक सुबह - सुबह टहलने वाले लोग ,वरना ज्यादातर  लोग उस समय निद्रा देवी की गोद में ही होते हैं।  जिस दिन आलस करती हूँ ,सारा   दिन बोझिल   होता  है। दिसंबर आते - आते कुहरे की चादर इतनी देर तक तनी होती है कि सूर्यदेव का दर्शन सम्भव नहीं होता। फिर भी क्या दिनचर्या रूकती है ?नहीं ,भले ही काम कुछ देर से शुरू हो ,पर होता ही है। तो फिर क्यों इस  नए साल के उमंग में कुछ ऐसा संकल्प लें जो नीरसता में भी सरसता का अनुभव करा दे। ऐसा तभी सम्भव है जब हम जीवन से प्यार करना सीख जायेंगे। सभी इंद्रियों का सचेतन अवस्था में होना मानव जीवन की एक बड़ी उपलब्धि है। आइए,इस उपलब्धि का हर्ष मनाएँ।जीवन के अनुराग और विराग को पूर्णतः भोगें। इस नितांत सत्य से हम  मुँह नहीं मोड़ सकते कि किसी प्यारे की मौत या बीमारी से जूझता कोई अज़ीज़ हमें तोड़ देता है। पर इस स्थूल शरीर से मोह करना भी तो एक भ्रम है। जितनी जल्दी इस भ्रम को समझ जायेंगे , निराशा हम पर हावी नहीं होगी। समय एक मरहम का काम करता है जो ज़ख्म की पीड़ा भुलाकर खुशियों की सीपियाँ बिखेर देता है। उन सीपियों को झोली में भरने का  संकल्प लें।
 नया साल  - नया संकल्प। बच्चे एकेडेमिक परफोरमेंस सुधारने का संकल्प लेते हैं तो गृहिणियाँ वजन कम कर के नीरोग रहने का। कोई समय से ऑफिस पहुँचने का संकल्प लेता है तो कोई अपनी कार्य - प्रणाली सुधारने का। संकल्प - विकल्प और तार्किक क्षमता में प्रकृति का सबसे सबल प्राणी मनुष्य है। बीते वर्ष का विश्लेषण करना वह जानता है। क्या खोया ,क्या पाया ?क्या अधूरा रह गया ?क्या सोचा था और क्या   हो गया ?आदि। संकल्प लेना  एक चेतनशील प्राणी का लक्षण है और उसका क्रियान्वयन करना सजग होने का प्रमाण। कुछ लोग संकल्प तो बड़े - बड़े लेते हैं पर उनका पालन करने में पिछड़  जाते हैं। इसलिए संकल्प भी अपने सामर्थ्य और साधन के अनुसार लेना चाहिए जिसे पूरा करना हमारे वश में हो अन्यथा  हताशा हाथ लगती है। फिर जीवन की खुशियाँ पराई हो जातीं हैं।   गौरतलब है कि उद्यमी ही लक्ष्य तक पहुँच पाते हैं और जब लगे कि हमने अपनी मंज़िल पा ली है तो अपने आप को शाबाशी दें ,जश्न मनाएं। खुश होने की किसी  भी स्थिति में समझौता नहीं करनी चाहिए।
घर की सुख - शांति बनाये रखने  का और नौकरी के  उच्चतम  शिखर तक पहुँचने का  संकल्प तो आपने हरेक साल लिया है। चलिए, उनसे इतर इस बार  कुछ ऐसा संकल्प लें जिसमे प्रकृति और पर्यावरण का हित हो तथा परोपकार की  भावना निहित हो। अपने घर की आया के बच्चे को एक घंटा  निःशुल्क  पढ़ा दें ,अनपढ़ को अक्षर ज्ञान दें ,प्रतिफल लौट कर अवश्य आएगा। अपने बंगले के वीरान कोने में अपने हाथों से पौधारोपण करें। जब वृक्ष बन कर वह फूलेगा - फलेगा ,यकीं मानिये बिलकुल वैसी ही प्रसन्नता होगी जैसी अपने बच्चों को बढ़ते देख कर होती है। अपने जीवन काल में पेड़ लगाने का संकल्प बहुत नेक है। इससे पर्यावरण की रक्षा होगी और आने वाली पीढ़ियों को एक हरे - भरे  ग्रह का सौगात मिलेगा। पतझड़ में भी आपको सुंदरता दिखाई देगी क्योंकि तब तक आप जान चुके होंगे कि कंकाल सा प्रतीत होता तरु भले ही कुछ समय के लिए निराश कर दे पर यह तो जीवन - चक्र है। पतझड़ में यदि लता पल्लवन  हो तो क्या वसंत मोहक लगेगा? आखिर जिस रोशनदान से रश्मि आती है ,उसी के पीछे तो रजनी भी गहराती है।तो ,खुश रहने का संकल्प लें। हर दिन एक उत्सव की भाँति हो। याद करें ,जब भैतिकवादी सुख - सुविधाओं का जुनून नहीं पनपा था तब घर में एक फ्रिज़ या टेलीविज़न आने पर भी मोहल्ले वाले उसे देखने आते थे। कितने अच्छे थे वो दिन। छोटी - छोटी खुशियाँ जीवन में रंग भरतीं थीं आज हम बड़ी खुशियों का इंतज़ार करते हैं जो मृगतृष्णा के अलावा और कुछ नहीं। बड़ी खुशियों के इंतज़ार में जीवन की शाम हो जाती है फिर इनका उपभोग करने के अवसर क्षीण पड़ जाते हैं। कुछ बिंदुओं पर ध्यान दें तो बहुत हद तक जीवन में खुश रहने के मूलमंत्र हम पा सकते हैं -
. जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाएँ। अपने मन में नकारात्मक विचार आने दें। जैसे ही ईर्ष्या ,द्वेष या बदला लेने की भावना आने लगती है , अपने साँसों की आवाजाही पर ध्यान केंद्रित करते हुए तेज क़दमों से चलें।
. हर आदमी का एक वज़ूद होता है भले ही वह पद - प्रतिष्ठा में आपसे छोटा हो। उनका मज़ाक हरगिज़ उड़ाएँ।
. ख़राब से ख़राब चीज़ों में भी अच्छाई ढूंढे।
. ईश्वरीय सत्ता पर भले ही विश्वास हो ,फिर भी जीवन की अनिश्चितता को सदा याद रखें।
. संवेदनशील बनें तभी आप फूलों की सुंदरता  ,पंछियों का कलरव ,ओस के बूँदों की शीतलता और बच्चों की तुतली बोली का आनंद उठा  पाएंगे।
. प्रण कर लें कि दिल में किसी प्रकार के  कलुषित विचार को नहीं पनपने देंगे और स्वस्थ दिमाग से कुछ अच्छा सीखने की राह पर चलेंगे ,तो कोई बाधा राह से डिगा नहीं पायेगी।
एक दिन मैंने आठ - नौ साल के एक बच्चे से कहा ,"पिछले साल वाली  गलतियाँ नए साल में नहीं दुहराना ,प्रण करो। " बच्चे ने मासूमियत से कहा ,"जी मैम  , इस बार नयी गलतियाँ करूँगा। " बच्चे ने एक  शाश्वत सच को याद दिला दिया ,"टू ऐर इज़ ह्यूमन। " गलतियाँ करना तो स्वाभाविक है पर बार- बार एक ही गलती हो इसे हमे ज़रूर देखना चाहिए क्योंकि इसका सीधा सम्बन्ध हमारे स्वभाव और जीवन - शैली से जुड़ा है जो हमे विषाद की स्थिति में ला सकता है।
याद कीजिये ,अंतिम बार कब आपने  बालकनी से ढलते सूरज का नज़ारा आँखों में क़ैद किया था ?कब बिटिया का निकर बदलते समय उसके पैरों को गाल से टिकाकर  रोमांचित हुए थेगली में खेलते बच्चों की  फ़ौज़ ने आपके आँगन में आयी  गेंद  माँगा और आपने प्यार से झिड़कते हुए एक बॉलर की  तरह उनकी ओर गेंद फेंका ,कब ? आपके ललाट पर  गिरती हुए ज़ुल्फ़ों को देख कॉलेज के  दिनों में कसा हुआ एक जुमला क्या अब याद आता है ? नहीं न। दौड़ -भाग  और  तनाव  भरी  ज़िन्दगी में हँसने के लिए वक़्त नहीं। तो , इस साल  पत्नी के साथ उन स्थानों को जाएँ जहाँ  आप हनीमून के लिए गए थे। तब और अब के परिवर्तन आपको गुदगुदाएंगे। अपने सच्चे मित्रों के साथ कुछ वक़्त गुज़ारें जो एक - दूजे के हमराज़ थे और बीती बातों को याद कर खूब ठहाके लगाएँ। बच्चों को लेकर लांग राइड पर जाएँ और हर वह काम करें जिसको करने में आपने खूब आनंद उठाया था ,मसलन बारिश में नहाना ,गुलेल मार कर टिकोले तोड़ना ,ठेले पर के गोलगप्पे खाना आदि एक बार ठान लें तो खुश रहने के अनेक रास्ते खुद खुद निकल आयेंगे।

संकल्पों का बाज़ार गर्म है। आइये ,हम भी नए साल में एक ऐसा रिज़ोल्युशन लें जो अब तक नहीं लिया यानि जीवन की अवस्था चाहे जैसी भी हो हम खुश रहने का प्रयत्न करेंगे। जीवन को एक उत्सव मान कर एक - एक पल को जीयेंगे।खुशियों   का सैलाब अपनी चपेट में हमारे दुखों  को बहा ले जाए और हम नित नयी उर्ज़ा से भरे रहें।

Thursday, 12 December 2013

पैंतालीस का प्रेम

कई दिनों से देख रही थी कि सामने वाले मकान में सफाई हो रही थी। मेरी बालकोनी से सामने वाले फ्लैट के अन्दर तक दिखाई देता है अगर पर्दा ठीक से न लगा हो।फिर हफ्ते भर दीवाली  की साजो सफाई में इतनी  व्यस्त रही कि  सामने वाले फ्लैट में कोई आ भी गया यह तब पता चला जब एक दिन सवेरे कुकर की सीटी सुनाई दी। विनीत जब ऑफिस से आये तो मैंने पूछा ,"क्या आपको पता है हमारा नया पड़ोसी  कौन है ?" " मुझे क्या पता, वैसे टहलते समय किसी मिस्टर बनर्जी की बात कर रहे थे सभी। वह यहीं फारेस्ट ऑफिसर हैं। "विनीत ने एक संक्षिप्त परिचय दिया और फिर टी वी देखने में मशगुल हो गए। मैंने डिनर टेबल पर लगाते हुए कहा ,"कल थोड़ा जल्दी आना। दीवाली के पहले परदे खरीदने हैं।" "अरे अकेली चली जाओ न। मुझे यह शौपिंग -वोप्पिंग बड़ी बोरिंग लगती है।"विनीत बड़े ही शांत स्वभाव वाले इंसान हैं। उन्हें केवल ऑफिस के काम से ही मतलब होता है। विवाह के पच्चीस साल के दरम्यान उसने जितनी बार मेरे बनाये खाने और मेरी तारीफ़ की है ,उसे अँगुलियों पे गिना जा सकता है।कुछेक बार उसने मुझे गज़रा भी लाकर दिया है ,पर इसलिए कि मेरे जन्मदिन पर ऑफिस स्टाफ ने उन्हें समझाया था कि पत्नी के लिए कुछ लेकर जाना।
                             दूसरे  दिन शनिवार था। विनीत के जाने के बाद घंटी की आवाज़ सुनाई दी ,मुझे लगा हमेशा की तरह घड़ी छूट  गयी होगी। जैसे ही दरवाज़ा खोला  ,सामने एक ३० - ३२ साल का युवक खड़ा  था। हाथ में एक भगोना, जिसे देते हुए उसने कहा ,"मैं आशीष बनर्जी सामने वाली बिल्डिंग में शिफ्ट किया हूँ। मेरे फ्लैट में सभी कामकाजी हैं सो नौ बजते - बजते सभी निकल जाते हैं। शाम ४ बजे दूधवाला आएगा ,प्लीज आप यह भगोना रख लीजिये। दूध ले लीजियेगा। "मैंने उस समय ज्यादा कुछ नहीं पूछा। अब तो हर तीसरे - चौथे दिन यह सिलसिला सा हो गया। भगोना देने और लेने  के साथ - साथ दो - चार बातें खड़े - खड़े ही हो जाती थी ,मसलन "शर्ट अच्छा लग रहा है। आज क्या खाया कैंटीन में? वगैरह – वगैरह ।धीरे - धीरे बातों का दौर भी बढ़ने लगा। एक दिन शाम को ऑफिस से लौटने के बाद जब वह दूध का भगोना लेने आया ,मैंने उससे चाय पी कर जाने का अनुरोध किया ,चाय की तलब उसे भी थी। साथ ही बैचलर हूड से उकताहट भी होती होगी ,इसलिए वह सहर्ष अंदर आ गया।  बातों - बातों में उसने बताया कि वह गोरखपुर का रहने वाला है। तीन विवाहित बहनों और माता - पिता के साथ का एक मध्यमवर्गीय परिवार। उसके लिए भी विवाह हेतु रिश्ते देखे जा रहे हैं,पर उसने माँ - पिताजी के हाथों यह जिम्मेवारी दे रखी  है।           
 इसी बीच विनीत  भी ऑफिस से आ गए। नीला ने उसका परिचय कराते हुए कहा,"ये हैं बनर्जी साहेब" , "नहीं - नहीं आप मुझे केवल आशीष कहें ",आशीष ने झट सुधारा । फिर विनीत और आशीष के बीच लम्बी बात -चीत हुई,ऑफिस से लेकर शहर के मनोरंजन केन्द्रों तक। अधिकतर समय  आशीष के ही बोलने की आवाज़ आ रही थी।
                                                   एक दिन सवेरे जब आशीष दूध का भगोना देने आया ,तब वह नहा कर निकली थी। सफ़ेद साड़ी में गीले बालों के साथ जैसे ही उसकी नज़र पड़ी ,वह देखता ही रह गया। नीला ने जब भगोना उसके हाथ से लिया ,तब उसकी तन्द्रा टूटी। आशीष कह उठा ,"आप तो गुलाब पर पड़ी शबनम की मोती सी लग रहीं हैं। गज़ब की सुन्दर। "अपनी तारीफ़ सुने एक अरसा बीत गया था।पहले तो उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि अब भी उसकी सुन्दरता कायम है। दिन का खाना  बनाते समय पुरानी यादें ताज़ा हो गयीं। स्कूल - कॉलेज में सखियाँ उससे यह कह कर जलतीं थीं ," तुम हमारे साथ मत चलो। ।सब   तुम्हे ही देखते हैं। हमारी तरफ तो कोई नहीं देखता। "फेयरवेल में उसे ही ब्यूटी क्वीन का खिताब मिला था। पर शादी के बाद विनीत की उदासीनता और गृहस्थी के भंवर में फंस कर रह गयी। आशीष के प्रशंसा भरे शब्द उसे जब न तब गुदगुदाते रहते। दूसरे  दिन रविवार होने के कारण आशीष नहीं आएगा ,उसे पता था। फिर भी किसी खटके से उसकी नज़र दरवाज़े की ओर  उठ जाती। सोमवार का तेज़ी से इंतज़ार होने लगा। उस दिन उसने जानबूझ कर दरवाज़ा खुला छोड़ा था। आशीष ने भगोना पकड़ाने  के साथ कहा ,"माँ कहती थी कि सुबह - सुबह सुन्दर चीज़ देखने से सारे दिन ताजगी बनी रहती है। माँ ने गलत नहीं कहा था। "नीला के  गालों में लालिमा छा  गयी। मुस्कुरा कर उसने उसे विदा किया।जाने क्या कशिश थी आशीष की आँखों में जो उसे बारम्बार अपनी ओर खींच रहीं थीं। उम्र के  पैंतालिसवें  पड़ाव पर यह क्या हो रहा है !किसी का इंतज़ार ,किसी के लिए बेचैनी ।ऐसा तो पहले कभी नहीं हुआ। विनीत के घर पर होने से एक तनाव सा महसूस होता। अकेलापन अच्छा लगता था। ऐसा नहीं था कि नीला में आया आकस्मिक बदलाव विनीत ने महसूस न किया हो। शाम के समय का उसका बनाव - श्रृंगार विशिष्ट हो गया था। पहले हर दो - एक दिन  पर विनीत से जिद करती थी कि घर के काम - काज  से वह थक जाती है ,बाहर जाकर सब्जी - राशन लाने का मन नहीं होता ,सो ऑफिस से आते समय वह लेते आया करे।विनित अपनी सफाई देता ,"मैं भी आठ घंटे कोई आराम फरमा  कर नहीं आ   रहा   हूँ ,तुम ही जा कर ले आओ ,वैसे भी दिन भर से घर में पड़ी हो। " लेकिन पिछले कई दिनों से ऐसी किच  - किच नहीं हो रही थी। विनीत को चाय सौंपने के बाद वह स्वयं ही झोला लेकर निकल पड़ती। कई बार विनीत  ने  उसे रसोई में काम करते - करते अपनेआप में मुस्कुराते भी देखा।एक दिन उसे टोहते हुए विनीत ने पूछा ,"आशीष को किसी दिन खाने पर  बुला लो ,आखिर अकेला प्राणी है। "किसी और के आने की बात रखने से भी वह कभी इनकार नहीं करती थी पर कुछ कड़वा ज़रूर सुना  देती,"हाँ  नौकरानी जो ठहरी ,मुफ्त में खिलाते रहो। "पर इस बार सहर्ष स्वीकार कर लिया। डिनर टेबल सजा कर वह खुद भी अच्छी  साड़ी पहन कर ,बालों में गजरा लगा कर तैयार हो गयी। आशीष बहुत खुले दिल से विनीत के स्वभाव और नीला के बनाये  खाने की तारीफ़ करता रहा। जाते - जाते आशीष ने विनीत को धन्यवाद के साथ एक कमेंट भी दिया ,"आप बड़े भाग्यशाली हैं जो नीला जी जैसी पत्नी मिली। मैंने गाँव में खबर भेज दिया है कि इनके जैसी रूपवान  और दक्ष लड़की से ही विवाह करूंगा। "नीला सकपका गयी।रात को इस पूरे घटनाक्रम पर दोनों देर तक बातें करते रहे। विनीत चुटकी लेता रहा ," आशीष तो तुम्हारा दीवाना हो गया है। "हमेशा काम के बोझ तले  मुरझाया नीला का  चेहरा अब खिल रहा था। विनीत को उसकी चुप्पी खलती। वह चाहता था वह पहले की तरह उससे लड़े  - झगड़े ,पर नीला एक नए जोश में सारे काम निबटाती। अगले रविवार को आशीष के आने का कोई सवाल नहीं उठता था क्योंकि उसकी छुट्टी होती थी। करीबन साढ़े  दस बजे कॉल बेल बजी। दरवाज़े पर आशीष खडा था। उसके हाथ में एक शादी का कार्ड भी। अभिवादन का स्वर सुनकर नीला चहकते हुए बाहर आयी ,"अरे !आज कैसे ?"आशीष ने शादी का कार्ड उसकी और बढाते हुए कहा ,"अगले महीने की बीस तारीख को मेरी शादी तय हुई है। आप दोनों को गोरखपुर आना होगा। माता - पिता को पता था कि  उनकी पसंद ही मेरी पसंद है ,इसलिए   केवल तारीख  की  सूचना  दे दी। "नीला का चेहरा एक बारगी उदास  हो गया ,फिर तुरंत सँभालते हुए उसने उसे बधाई दी।

                                         इस घटना के बाद दो दिन यूँ ही बीत गए। तीसरे दिन अचानक विनीत ने ऑफिस से आते समय एक गजरा खरीद लिया। शाम के छह बजे थे ।नीला अपने कमरे की साज़ - सफाई  में लगी  थी। पिछले कई  शामों की तरह बहुत उत्साहित नहीं। अचानक विनीत ने उसे पीछे से आकार थाम लिया और कहा ,"चलो ,तैयार हो जाओ ,आज बाहर चलते हैं। दिन भर काम में लगी रहती हो। "इस अप्रत्याशित प्यार भरे हमले को तो वह जाने कब से भूल चुकी थी। विवाह के आरंभिक सालों में विनीत शायद ही खाली हाथ घर आता। कई बार तो उसकी सुन्दरता पर कुछ पंक्तियाँ गा देता। इस प्यार से अभिभूत वह जल्दी ही तैयार हो गयी। आईने के सामने एक बड़ी बिंदी लगाते समय विनीत ने पीछे से उसके  बालों  में  गजरा टांक दियाऔर फिर बाँहों  में भर कर कहा ,"वाह !क्या लग रही हो। ज़न्नत की हूर कहूँ या आँखों की नूर। "शायरी अभी और होती कि नीला ने उसके होंठों पर अँगुली रखते हुए कहा ,"अब ,चलो भी। "दीवाली की खरीदारी दोनों ने साथ- साथ करने की ठानी। विनीत के इस  परिवर्तित व्यवहार पर नीला सोचती कि आशीष का उसके मोहल्ले में आना उसके जीवन में बहार लाने के लिए ही था। ऐसा बहार जो  अब कभी   पतझड़ नहीं झेलेगा ,आखिर एक - दूसरे  में  आकर्षण खोजने का मूलमंत्र आशीष ने दे दिया था।

Friday, 29 November 2013

आत्मसंयम यानि  मन पर विजय

भौतिकवादी समाज की  कुरीतियों में काम ,क्रोध ,लोभ, मोह ,अहंकार आदि मनोविकार मनुष्य के मन पर अधिकार बनाए हुए हैं और अवसर पाते ही अपना दुष्प्रभाव दिखाने लगते हैं। बड़े से बड़े महात्मा हों या उच्चाधिकारी ,आत्म संयम के अभाव में अपनी प्रतिष्ठा खो बैठते हैं।  ये नदी के प्रभाव  की  भांति बहते हुए मनुष्य - जीवन में अनेक बाधाएँ डाल  कर उसे मलिन और निराशपूर्ण बना देते हैं। इनकी प्रतिद्वंद्विता में आत्मसंयम का  सहारा ले लिया जाए तो मनुष्य जीवन की  सफलता में संदेह नहीं रहता। इन पर काबू पाना या अपने को वश में करना ,जगत को जीत लेना है। साधारण मनुष्य की  तो बात ही क्या ,बड़े - बड़े सम्राट भी काम के अधीन हो आत्म - संयम की तिलांजलि दे डालते हैं और कठिनाइयों की  कीच में अवश्यमेव  फंस  जाते हैं। इतिहास प्रमाण है कि गांधीजी ने क्रोध पर नियंत्रण कर के प्रेम और अहिंसा के अस्त्रों द्वारा अंग्रेजी साम्राज्य का अंत किया। बुद्ध ने राजसी वैभव के मोह और लालच को त्यागा तभी वे सत्य की  साधना कर सके। कहाँ   तो  एक साधारण सी जागीर और कहाँ उसके स्थान पर इतना बड़ा महाराष्ट्र प्रदेश !कहाँ थोड़े से मावली और कहाँ बीजापुर के सुलतान का असंख्य दल - बल ,अफ़ज़ल खान और शाइस्ता खान जैसे दुर्दम्य सेनापतियों का सामना करना कोई हँसी  - खेल था। पर वीरवर शिवाजी ने असफलता का कभी नाम भी नहीं सुना क्योंकि उनमे आत्मसंयम कूट - कूट कर भरा हुआ था।
                 

                                         जो व्यक्ति इंद्रियों के दास होते हैं ,वे इंद्रियों की  इच्छा - शक्ति पर नाचते हैं। संयमहीन पुरुष सदा उत्साह- शून्य ,अधीर और अविवेकी होते हैं ,इसलिए उन्हें क्षणिक सफलता भले मिल जाए ,अंततः उन्हें बदनामी और पराजय ही मिलते हैं। आत्मसंयमी व्यक्तियों में सर्वदा उत्साह ,धैर्य और विवेक रहता है जो उनकी सफलता की  राह तय करते हैं। मानव की  सबसे बड़ी शक्ति मन है इसलिए वह मनुज है। प्रकृति के शेष प्राणियों में मन नहीं होता ,अतः उनमे संकल्प - विकल्प भी नहीं होता। मन की  शक्ति अभ्यास है ,विश्राम नहीं। इसलिए तो मन मनुष्य को सदा किसी न किसी कर्म में रत रखता है। आत्म - संयम को ही मन  की  विजय कहा गया है। गीता में मन - विजय के दो उपाय बताये गए हैं-- अभ्यास और वैराग्य। यदि व्यक्ति प्रतिदिन त्याग या मोह - मुक्ति का अभ्यास करता रहे तो उसके जीवन में असीम बल आ सकता है। यह कुछ महीने की  देन  नहीं होती है,एक लम्बे समय की  ज़रुरत है। फिर तो दुनिया उसकी मुट्ठी में होगी। एक बार मोह - माया से विरक्त हो जाओ तो वैराग्य मिल जाएगा। भारत में आक्रमण कारी शताब्दियों तक लड़ाई जीत कर भी भारत को अपना नहीं सके क्योंकि उनके पास नैतिक बल नहीं था। शरीर के बल पर हारा  शत्रु  बार - बार आक्रमण करने को उद्धत होता है परन्तु मानसिक बल से परास्त शत्रु स्वयं - इच्छा से चरणों में गिर पड़ता  है। इसलिए तो हम प्रार्थना करते हैं - "हमको मन की  शक्ति देना ,मन विजय करें ,दूसरों की  जय से पहले खुद को जय करें। "