इस ब्लॉग से मेरी अनुमति के बिना

कोई भी रचना कहीं पर भी प्रकाशित न करें।

Monday, 1 September 2014

मैंने लिख दिया प्रेम
---------------------------

मैंने लिख दिया प्रेम
हवाओं के तरन्नुम में
आँखों की नमी सोख कर
इठला उठी मेघमाला।

मैंने लिख दिया प्रेम
डाल - डाल और पात - पात पर
अब न दावानल रहा ,न पतझड़
बरस उठा सावन।

वह अवर्णित भावों वाला प्रेम
गज़ब का तिलस्मी और
अपूर्व तेजस्वी है।
 समुद्र सा ज्वार इसमें
हवाओं का भार इसमें
परिंदों  का संगीत थामे
जिजीविषा का पर्याय
प्रेम अलौकिक है।

मैंने लिख दिया प्रेम
ब्रह्माण्ड के एक - एक अणु पर
क्षिति ,जल ,पावक, अम्बर, वायु
सिमट गए एक देह में ,और
मेरी सम्पूर्ण चेतना
यायावरी कल्पनाओं में विचर  
कोरे कागज़ पर उतर गयी
 मैंने लिख दिया प्रेम
उसी कागज़ पर
शब्द गीत बन गए। 

Monday, 4 August 2014

बरसा दो सावन
--------------------------


कुछ रंग बरसा दो सावन
खिल उठे फुनगी - फुनगी मनभावन
जरा देखा है विस्तृत शाखों ने
सुख की गति खो कर अगन में
विलग हुए थे पात - पात
होकर रुग्ण जीवन समर में
कुछ अमृत बरसा दो सावन
जी उठे मरणासन्न से कानन।
कैसे भूलूँ वह उत्ताप काल
अंजुरी भर के सूरज का
फट - फट कर धरती रोई थी
कहर बरपा था प्रचंड समीर का
कुछ बूँदें बरसा दो सावन
भर जाए धरती का  दामन।
वन - प्रांतर है जीवन - गाथा
हर्ष - विषाद का आना और जाना
ठूंठ खड़ा रहा जो निर्भीक ,निडर
कुसुमाकर का सुख उसने ही जाना
कुछ सुध बरसा दो सावन
आनंद ,उमंग हो सर्वत्र पावन।

Friday, 4 July 2014

  कभी फुर्सत में आना 
-------------------------------------

  कभी फुर्सत में आना
मंदिर के चौबारे में बैठ 
अपनी- अपनी ज़िन्दगी बतियाएंगे 
छोटी - छोटी खुशियाँ बाँटेंगे
अपने वर्तमान की खूबियाँ  
बार - बार जतलाएँगे
जैसे ही तुम अतीत कुरेदोगे कि
इस खम्बे के पीछे की 
लुका - छिपी याद है ?
मैं विषय - वस्तु बदल कर 
शब्दों के जाल में तुम्हें फांस लूँगी
कहीं वो बीता पल 
मेरे वर्तमान पर हावी न हो जाए 
और ,जब उठने की बारी आएगी 
तब एक नहीं ,अनेक  बार दुहराएंगे 
"अच्छा ,अब चलते हैं "
पता नहीं कौन किससे इज़ाज़त
 माँगता है ?
फिर ,एक गहरी चुप्पी के साथ 
अपनी - अपनी राह पे चल पड़ेंगे 
एक अनकहा संवाद आँखों में लिए 
बार - बार मुड़कर देखेंगे 
यह अहसास देते हुए कि
तुम अब भी याद आते हो 
मेरा अतीत ,मेरे पास ठहरा हुआ है। 

Friday, 6 June 2014

याद आते हैं
----------------------


साल दर साल बीत गए 
घर - आँगन सब छूट गए
 राग नए ,रंग नए 
नव परिवेश में ढल गए। 

याद आते हैं मस्ती के मेले 
ताल - तलैया औ' सावन के झूले 
कच्ची उम्र की पक्की कसमें न भूले 
खट्टे - मीठे वो शिकवे - गिले। 

हाथ बढ़े जब आसमां छूने 

मन में उत्साह भरे दूने 
सूरज की तपिश तब जाना मैंने 
तेवर हवा का पहचाना मैंने। 

अपना नहीं है कुछ भी यहां 

तेरे - मेरे में बंटा है जहां 
रुत शहर की कभी भाई कहाँ 
न शीतल छाँव न परिंदे जहाँ। 

आँगन में उतरती धूप न भूले 

बूँदों की थाप पर नर्तन न भूले 
जार - जार रोए थे मिल कर गले 
आज के बिछुड़े जाने कब मिले। 

अब तो हम प्रवासी पंछी भए 

मौसम संग भी लौट न पाए 
सुख के भंवर में उलझते जाएँ 
बरसाती यादों में बस बह जाएँ।

Sunday, 13 April 2014

प्रेम के अर्थ
----------------
पीत  पर्ण फिर हरियाए
वायवी उड़ानों संग हर्षाए
वन - प्रांतर में चली पुरवाई
गंध - गंध सुरभित अमराई
सौगंध पुराने कुछ याद आए
पोर - पोर अमलतासी हो गए।
 किंशुक दावानल सा भरमाए
महुआवी आँखों में शोख छलकाए
अरुणोदय आभा सर्वत्र मुस्काई
अंग - अंग भर तरुणाई
तुम जो ऐसे में मिल गए
मन के अनुबंध हो गए।
देहरी पर बंदनवार सजाए
दिन अभिसार के लौट आए
यायावरी मन में बजी शहनाई
हल्दी रंग में देह लजाई
सपने सारे वासंतिक हो गए
प्रेम के अर्थ व्यापक हो गए। 

Sunday, 16 February 2014

मुक्ति का गीत
---------------

वहशियों के नगर में रहना 

है नित काँटों पर चलना 
अब कोई कृष्ण नहीं आएगा
केवल दुर्योधन दांव लगाएगा 
अपनी अस्मत के बन रक्षक
लड़ जाएँ उनसे जो बनते भक्षक 
देख लिया जी कर औरों के लिए 
समय आया अब जीएँ स्वयं के लिए 
हमारे अस्तित्व पर लगता सवाल 
हर सवाल पर उठता बवाल 
ज्वलंत अवरोधों पर बहस छोड़ के 
हम बन गए  विषय विमर्श के 
यक्ष प्रश्नों पर लगा कर विराम 
छद्म वायदों से वो कमा रहे नाम 
कर्ता है अंततः छलता 
विश्वास का पर्दा तार - तार करता 
लगा लो चाहे जितनी ईश्वर से गुहार 
द्रौपदी का चीर अब नहीं पाता विस्तार 
तो अब सक्षम और समर्थ बन जाएँ 
हर विपदा का खुद ही हल बन जाएँ 
तोड़ कर सारी वर्जनाएँ
मुक्ति का गीत गाएँ

Monday, 20 January 2014

आई री ऋतु वसंत सखी
-------------------------------------------------
प्रकृति जिस समय अपने चरमोत्कर्ष पर होती है उसी समय जीवन का उदात्त काल होता है। वसंत वनस्पति के संवत्सर तप का अत्यंत मनमोहक पुरश्चरण है। सुरभित पुष्पों के बहुरंगी प्रसाधन से युक्त प्रकृति हमारी अंतश्चेतना का साक्षात्कार ऐसी उदात्त अनुभूतियों से कराती है जो अलौकिक है। प्राणों की अनिर्वचनीय रसदशा की  उदात्तता सौंपने वाली सृष्टि के अजस्र औदार्य का प्रतिफलन है वसंत। प्रकृति के सान्निध्य में ही मानव चेतना का विकास हुआ। क्षितिज के उस पार से वासंती विभव से आप्यायित वसुंधरा को पुलक स्पर्श देने के लिए भुवन भास्कर विशेष ऊर्ज़ा से भरे होते हैं जो मकर संक्रांति के बाद से दिखाई देने लगता है। वसंत की  मादकता धरती के कण - कण में समा जाती है ,इतना मधुमय कि इस ऋतु को मधुमास के नाम से जाना जाता है। "आयी री, ऋतु वसंत सखी " एक साथ आनंद ,उल्लास और कौतुहल पैदा करता है।
ऋतुराज के आविर्भाव में वन - प्रांतर और लता - गुल्म कोमल पत्तों से अपना श्रृंगार करते हैं। वातावरण दुग्धधवल हास्य के झोंके से अनुगुंजित होता दिखता है। प्रमोदिनी सी यामिनी और मधुरहासिनी सी उषा गेहूं की बालियों पर , तीसी की मरकती डालियों और सरसों के पुखराजी फूलों पर अपना प्रभाव छोड़ने लगती हैं। किसलय ,कलिका ,पुष्प और नवलता विहान जैसे अभिनव श्रृंगार वसंत की अगवानी के लिए हैं। अलिकुल का मंडराना ,मलय पवन का झूमना और कोयल की मधुर तान जीवन को सुखमय बनाने के रसायन हैं। पतझड़ की मार से अभिशप्त, झंखाड़ पड़े पर्वतों पर टेसू की टहक लाल सिंदूरी आभा चमकने लगतीं हैं मानो लाल चुनर ओढ़े कोई नई नवेली दुल्हन स्वर्ग से धरती पर पधार रही हो। शीत का प्रकोप झेलती नदियाँ हिमवत थीं ,अब पारे सी पारदर्शी हो रही हैं। शिखिसमूह नर्तन करते हैं। मकरंद और पराग की धूम मची होती है। वसंत सचमुच वसंत है जिसमे केवल आनंद का वास है। इसलिए तो भगवान श्रीकृष्ण ने अपने को "ऋतुनां कुसुमाकरः "कहा है।
  वसंत स्वाभाविक है और प्रकृति अनंत। परिवर्तन बाहरी है  पर मनुष्य और प्रकृति में आंतरिक एकता है। निराला का वसंत बोध ईश्वरीय है। वह प्रकृति के साथ प्राणियों में नवजीवन का संचार करते हैं। "आज प्रथम गाई पिक पंचम "   में सौंदर्य का पहला अनुभव जीवन को पूर्णतः बदल देता है और "गूंजा है मरू विपिन मनोरम "में सौंदर्य की लयात्मक अभिव्यक्ति है।  कविहृदय शायद ही इस ऋतु में मूक बैठे!यह तो महाकाव्य और पुण्य श्लोक रचने के लिए प्रेरित करने वाला काल है। त्रिपुरासुर के विनाश के लिए जब कामदेव ने योगिराज शिव की समाधि भंग करनी चाही तो उसे वसंत की सहायता लेनी पड़ी। अपनी संस्कृति की समृद्धि पर भी एक नज़र डालें। जो वसंत कामदेव का सहायक है वही जीवन में रत होने के लिए मनुष्य को प्रोत्साहित करता है और वही रंग दे वासंती चोला में आत्मोत्सर्ग के लिए भी प्रेरित करता है। वसंत मुक्ति का प्रतीक है   तभी तो कली जब फूल बनती है तब अपनी संकीर्णता  से मुक्ति पा जाती है। वसंत का ध्येय भी यही है। यह जीवन ,मुक्ति और सौंदर्यानुभव तीनों रूपों में लोक को समर्पित है।

                 वरद साहित्य और संस्कृति की वरदायिनी वागीश्वरी सरस्वती वसंत की शोभा में चार चाँद लगा देती है। आम्रमंजरियों का पहला चढ़ावा श्वेत पद्म पर विराजमान सरस्वती को अर्पित होता है ताकि देश की संतति परम्परा  आम्र वृक्ष की शाखाओं  की तरह अपने यश का चतुर्दिक विकास करे। यह काल फाल्गुन और चैत का काल है। फाल्गुनी पूर्णिमा के दिन आनंद और उल्लास का महोत्सव प्रेम - मिलन एवं विरोध - विस्मरण के मधुमय आमंत्रण का पर्याय पर्व होली के रूप में  मनाया जाता है।    प्रकृति यूँ तो स्वयं में सर्वोच्च गुरु है पर आनंद की स्रोतस्विनी सभी प्राणियों में कहाँ उमड़ती है ? भौतिकवादी युग में तो कदापि नहीं। कुसंस्कारों के जीर्ण - शीर्ण पत्तों को त्याग कर ,नवीनता और प्रगतिशीलता के नव किसलयों व पल्लवों से हम अपना श्रृंगार कर सकें तभी वसंत उत्सव बन कर आता रहेगा। फिर तो काल चक्र भले वर्ष में एक बार इसका रसास्वादन कराये पर मानव का प्रयास  इसके उदात्त गुणों को अपना कर आजीवन सौंदर्ययुक्त  रहेगा।