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Wednesday, 17 July 2013

मैं एक पेड़ होती


 मैं एक पेड़ होती 

कभी - कभी लगता है 
कितना अच्छा होता गर 
मैं एक पेड़ होती  !
मेरी ठंडी घनी छाँव में
तुम थोड़ा सुस्ता लेते
जो होते श्रांत - क्लांत ।
देख तुम्हें खिल उठते
मेरे  फूल से अंग - प्रत्यंग
और गिर कर तुम्हारी राहों में
सुन्दर सेज सजा देते ।
मेरी शाखाओं में बैठे पंछी
मधुर स्वर में कलरव कर
तुम्हे मीठी नींद सुला देते
मेरी तना से सट कर
तुम्हारा खड़ा होना
वह स्पर्श सुख देता
जिसके अहसास से आजीवन
मैं झूमती - लहराती रहती
एक अनोखे उन्माद में ।
इक सपना भी संजोयी हूँ
कि जिस दिन गिर जाऊँ
भीषण आँधी की मार से
तुम मुझे माटी दे देना
तुम्हारा स्पर्श चिरनिद्रा में भी
अपेक्षित रहेगा।     

Tuesday, 2 July 2013

जान नई भरते हैं

 जान नई भरते हैं 

मौसम की अंगड़ाई कुछ कहती है 
फिज़ाओं में तरन्नुम भरती है 
भूल कर अपनी खताओं को
 एक - दूजे का  हाथ थामते हैं  ।
बड़ी शिद्दत से सजाया है यादों को 
खट्टी - मीठी बातों और तकरारों को 
सुस्त पड़ी बेजान धडकनों में 
आओ जान नई भरते हैं । 
रात शबनमी बार - बार आती नहीं 
नूर की कशिश हर दम लुभाती नहीं 
धवल चांदनी का नेह निमंत्रण 
आओ मिल कर स्वीकारते हैं ।
कारवाँ ज़िन्दगी का चलता जाएगा
किस टीले पे जाने कब पड़ाव आएगा 
थोड़ा तुम चलो ,थोड़ा मैं चलूँ 
ख्वाब कोई नया बुन डालते हैं ।
जी रहे हैं हम इस तमन्ना में 
कभी तो रंग भरेंगे कोरे कागज़ में 
शमा इक जलती है उम्मीदों में 
जलने को परवाने मचलते हैं ।
सागर सी ख़ामोशी में हमारी 
छिपी है प्यार की गहराई तुम्हारी 
ढहती हुई रेत को समेट  कर 
चलो ,महल इक नया बनाते हैं ।

Tuesday, 25 June 2013

मृगतृष्णा 

अनंत मुरादों से भरी झोली 
कंधे पे लटकाए घूमता है वह 
इसके वजन से थकता - हाँफता
बेहाल परेशान हो जाता है 
हर मुराद में निहित खुशियाँ 
कभी छलक जातीं कभी झलक जातीं 
अक्षय होतीं  हैं ये ईप्साएँ
एक पूर्ण हुई  नहीं कि
कई और जनम जातीं  हैं ।
इन्हीं ईप्साओं के इर्द - गिर्द 
घुमती है दिनचर्या अहर्निश 
इनसे भरता उसके सुख का पैमाना 
यही देता उसकी सफलता का आँकड़ा।
अनेक बार तो इच्छाएँ 
पीढ़ी दर पीढ़ी ढोई जातीं हैं 
कभी परदादाओं के हेतु 
कभी भावी संतानों के हेतु ।
क्या ही अच्छा होता 
उतना ही पसारता पैर वह 
जितनी लम्बी चादर होती !
चाहतों की मृगतृष्णा में 
वह दौड़ता रहता है 
क्योंकि उसे पता नहीं कि
जीवन सुगन्धित करने वाली 
संतोष की कस्तूरी तो 
उसके जेहन में  ही है ।

Tuesday, 4 June 2013

  मानव - चित्र 

इन ईंट के पक्के मकानों में 
दरीचों से झाँकती धूप
स्वर्ण उजालों सी करती हैं जगमग 
मलमली गलीचों में 
दूब सी नर्माहट
बेहद भली लगतीं हैं ।
 विशाल फूलदानों में 
रंग - बिरंगे फूल 
नैसर्गिक छटा बिखेरते हैं ।
दीवारों के खूबसूरत कैनवस 
पर अपनों के चित्र 
आत्मीय अहसास देते हैं ।
सब कुछ तो है इस पुख्ता मकान में 
कुछ नहीं है तो बस 
उन रिश्तों की गर्माहट जो 
एक चित्र  में क़ैद हो रह गयी है ।
भरे - पूरे घर में हर कोई 
एकाकी जीवन जी रहा है 
एक - दूसरे से बेखबर 
अपने ही बुने जाल में फंसा 
अनजाना सा गिरह काटता हुआ ।
दीवारों की कलात्मकता में सुशोभित है 
आंसू  बहाता एक मानव - चित्र 
लोग कहते हैं कि यह पेंटिंग 
इस घर की शोभा बढ़ा देता है 
वह इसलिए कि वास्तविकता 
सदैव सराही जाती है ।
घर की बेजुबां होती 
भावहीन रिश्तों की कहानी 
यही दर्शाता है 
बाकी सब बेमाने हैं 
 खोखले हैं ।

Sunday, 26 May 2013

आलेख

                                                                            मुक्तिबोध
कल्पना कीजिये एक पिंजरे में बंद पक्षी ...पंख फड़फड़ा कर अपनी वेदना ज़ाहिर करते - करते या तो लहूलुहान हो जाता है या फिर थक कर सो जाता है  ।कमोबेश यही स्थिति औरतों की भी है ।पंख है ,परवाज़ नहीं। आदिकाल की देवी ,मध्य काल की योग्य स्त्री ,भक्ति काल में माया बन गयी और आज का बाजारवाद उसे वस्तु में बदल दिया। परिवर्तन  का आयाम सबसे ज्यादा महिलाओं में ही दिखा ।कभी उसके अक्षर ज्ञान को मुक्ति का साधन माना गया तो कभी पूरी तरह साक्षर होकर आत्मनिर्भर होने को। आज औरतें बहुत हद तक आत्मनिर्भर हैं पर हर आत्मनिर्भर औरत सुखी नहीं ।ममता ,कोमलता जैसे स्वाभाविक गुणों की तिलांजलि देकर पुरुषों से कन्धा मिला कर चलने वाली स्त्रियाँ संतुष्ट भी नही हैं। सुख को उसने खरीद लिया पर सुख को महसूस नही किया ।आधुनिकता की आड़ में औरतों की नई भूमिकाएं उन्हें एक जाल में फांस लेती है ।एक निश्चित दायरे में रह कर आत्मविश्वास से लबरेज अपनी जिम्मेदारी निभाना और बात है ।यह स्वतंत्रता प्रगति का सूचक नहीं है ।पितृसत्ता आज भी है भले ही स्त्री - पुरुष के संबंधों में खुलापन और नजदीकियाँ बढ़ी हैं ।यह बदलाव आर्थिक दृष्टिकोण से मज़बूत हुआ है न कि सामाजिक दृष्टिकोण  से ।समाज तो इसे मजबूरीवश स्वीकारता गया  ।जहां परिवार का स्टेटस  बढ़ा है वहीँ आपसी विश्वास की लौ बुझने लगी है। आधुनिकता का लिबास ओढ़े पुरुष आज भी अपनी पत्नी के सहकर्मी पुरुष के एक फ़ोन पर चिल्लाने लगता है और आवश्यकता वश अगर वह अपने पुरुष मित्र के बाइक पर बैठ गयी तो एक बवंडर खड़ा कर देता है। वर्षों का साथ विश्वास के रेतीले आधार पर खड़ा भरभरा जाता है ।इसलिए  शादी  अपना आकर्षण खोकर कहीं न कहीं एक समझौता बन कर रह गया है ।
प्रेम और विश्वास के साथ आगे बढती स्त्रियों को पुरुषों का अपेक्षित सहयोग मिलता रहे तो इस बदलाव और स्त्री - पुरुष के संबंधों में हो रहे बदलाव को अपनाना सहज हो जाएगा ।इंसानों में मुक्तिबोध ज्यादा पनपता है ।समाज के सही संचालन के लिए नियम अपेक्षित हैं लेकिन किसी एक को बंधन में इतना जकड़ दिया जाए कि वह छटपटा उठे तो फिर मुक्ति की भावना विद्रोह का स्वर अख्तियार कर लेती है ।
 जब से स्त्रियाँ अपने अधिकारों के प्रति सजग हुईं तब से समाज में एक नई बहस छिड़ी जो कभी स्त्री - समानता ,कभी स्त्री - जागरण तो कभी स्त्री - विमर्श के रूप में निरंतरता बनाये हुए है ।यह बहस पश्चिम के व्यापारवादी तर्क से पैदा होते हैं और विकासशील देशों पर थोप दिए जाते हैं ।भारत में कामसूत्र और मनु संहिता जैसी रचनाओं में कभी   स्त्री का चरित्र - हनन नहीं किया गया जैसा कि पश्चिम में लिखे सेक्स - साहित्य में उधेड़ा गया। वहाँ माँ के  संस्कारवादी चरित्रों से हटकर महज एक भोग्या मान कर लिखा गया।  स्त्री विमर्श ने स्त्री के मुक्ति संघर्ष को धार प्रदान की है। यदि यह विमर्श किसी एक वर्ग की श्रेष्ठता का हिमायती न हो ,दोनों की समानता का हिमायत करता हो ,तभी एक सह - अस्तित्व परक समाज की स्थापना होगी। स्वतंत्र विचार ,स्वतंत्र प्रतिक्रिया और स्वतंत्र हस्तक्षेप मुक्ति की पहली शर्त है ।उच्च और निम्न वर्ग के लिए यह इतना पेचीदा नहीं है जितना मध्य वर्ग  की स्त्रियों के लिए  ,क्योंकि यही वर्ग शिक्षा के क्षेत्र में आगे है।  यही वर्ग महत्त्वाकांक्षी और जागरूक है तथा इसे ही औरों से अधिक प्रतिरोधों का सामना करना पड़ता है ।साहित्य समाज का दर्पण है। आलोचक चाहे जो बोलें पर एक ऐसी स्त्री जिसके लिए देह उसकी पूँजी ,पहचान और जीने का आधार है ,वह पूर्णतः स्वतंत्र है ।वह सक्षम ,आत्माभिमानी और अपराधबोध से मुक्त है ।वह सामजिक और आर्थिक रूप से स्वतंत्र है और नैतिकता के परंपरागत मानदंडों को तोड़ती हुई एक नए समाज की संरचना में व्यस्त है ।समय आ गया है कि ज्ञान की पराकाष्ठा को समझते हुए लिंग आधारगत भेदभावों को हटाकर एक शिक्षित समाज की बुनियाद पर ध्यान दिया जाए जो स्त्रियों के मुक्तिबोध का सूचक होगा ।

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Tuesday, 7 May 2013


बरगद की छांव में

बचपन के गलियारे में
यादों का काफ़िला गुजरता है
दो बलिष्ठ बाँहों का सहारा
पल भर में कौंध जाता है
बालों को सहलाती अंगुलियाँ
मीठी नींद सुलाती थीं
तारों तक पहुँचने की ज़िद
जाने कैसे पूरी हो जाती थी
चाह नहीं था कोई ,आस नहीं
पिता के सान्निध्य में स्वर्ग था
सपने नहीं थे ,उम्मीदें नहीं
बरबस मिला प्यार ही  संसार था
और चाहिए भी भला क्या था ?
मेरी रूदन में भूख का अंदेशा
मेरी ख़ामोशी में अनकही  पीड़ा
मिल जाता  था उन्हें सब संदेशा
अभिलाषाएँ पनपीं  जब वयः में
गुरु ज्ञान सा पथ सुगम बनाया
सही - गलत को तौल कर तुला में
जग की रीत बखूबी समझाया
बचपन घुला समय की धार में
जिम्मेदारियां  जब सर चढ़ती हैं
एक अज्ञात शक्ति उनके निवारण को
बा 'के स्मरण मात्र से आ जाती है ।
खँडहर देख महल की भव्यता का
जैसे पता खुद - ब- खुद लगता है
झुर्रियों से ढँकी खोखली परतों में
वैसे बीता दर्प   चमकता है ।
जी चाहता है, भूल कर भाग -दौड़ 
कुछ सुस्ता लूँ बरगद की छांव में
काँपते हाथों से गिरता  आशीष
पहन लूँ समेट कर तावीज में ।

Monday, 6 May 2013


  असर यूँ हुआ 

ख्वाब - ए - इश्क रंगीन सजते रहे 
हम मोम की तरह पिघलते रहे 
चंद मुलाकातों का असर यूँ  हुआ
 कि खुद  से  खुद  को  हम  तलाशने लगे  ।

थमता नहीं जीवन में जलजला 
जाने कैसे शुरू हुआ यह सिलसिला 
उनसे दिल लगाने का असर यूँ हुआ 
कि अपने भी बेगाने लगने लगे ।

साहिल की मानिंद हम तटस्थ रहे 
लहरों की भाँति वह आते - जाते रहे 
सागर तट पर रहने का असर यूँ हुआ 
कि हर तूफ़ान को हम गले लगाने लगे ।

सरे बाज़ार भी तन्हाइयाँ साथ चलतीं 
पहाड़ सी रातें  काटे नहीं कटतीं 
गुमसुम सा रहने का असर यूँ हुआ 
कि  इशारों - इशारों में लोग बतियाने लगे ।

अजीब सी खुमारी आँखों  में   छाने लगी 
सुर्ख़ पत्तों में हरियाली आने लगी 
चेहरे के बदलते रंगों का असर यूँ हुआ 
कि शहर की सुर्खियाँ हम भी बनने लगे ।