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Tuesday, 7 May 2013


बरगद की छांव में

बचपन के गलियारे में
यादों का काफ़िला गुजरता है
दो बलिष्ठ बाँहों का सहारा
पल भर में कौंध जाता है
बालों को सहलाती अंगुलियाँ
मीठी नींद सुलाती थीं
तारों तक पहुँचने की ज़िद
जाने कैसे पूरी हो जाती थी
चाह नहीं था कोई ,आस नहीं
पिता के सान्निध्य में स्वर्ग था
सपने नहीं थे ,उम्मीदें नहीं
बरबस मिला प्यार ही  संसार था
और चाहिए भी भला क्या था ?
मेरी रूदन में भूख का अंदेशा
मेरी ख़ामोशी में अनकही  पीड़ा
मिल जाता  था उन्हें सब संदेशा
अभिलाषाएँ पनपीं  जब वयः में
गुरु ज्ञान सा पथ सुगम बनाया
सही - गलत को तौल कर तुला में
जग की रीत बखूबी समझाया
बचपन घुला समय की धार में
जिम्मेदारियां  जब सर चढ़ती हैं
एक अज्ञात शक्ति उनके निवारण को
बा 'के स्मरण मात्र से आ जाती है ।
खँडहर देख महल की भव्यता का
जैसे पता खुद - ब- खुद लगता है
झुर्रियों से ढँकी खोखली परतों में
वैसे बीता दर्प   चमकता है ।
जी चाहता है, भूल कर भाग -दौड़ 
कुछ सुस्ता लूँ बरगद की छांव में
काँपते हाथों से गिरता  आशीष
पहन लूँ समेट कर तावीज में ।

2 comments:

  1. सुन्दर प्रस्तुति बहुत ही अच्छा लिखा आपने .बहुत ही सुन्दर रचना.बहुत बधाई आपको

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  2. बरगद की छांव भी हमेशा कहाँ मिलती है ..... बहुत सुंदर रचना

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